टीकमगढ़

जनता के अधिकारों की पुनः समीक्षा के साथ आंदोलनों की तय हो गाईडलाईन

एम.ए.खानअफसर एमपीसीजी एक्सप्रेस न्यूज़

जनता के अधिकारों की पुनः समीक्षा के साथ आंदोलनों की तय हो गाईडलाईन

राजनीतिक पोषित बंद और आंदोलनों से आम जनजीवन प्रभावित नहीं होना चाहिए इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट आम जनता के अधिकारों के प्रति स्वतः संज्ञान लेना चाहिए

टीकमगढ़ :- दिल्ली में किसान आंदोलन को एक माह से अधिक का समय गुजर गया है, तथा सरकार व किसानों के बीच जिस तरह का गतिरोध है, उससे जाहिर है कि यह लड़ाई आगे भी लंबी चलने वाली है , सरकार जो समझाना चाहती है तथाकथित किसान नेता उसको सुनना या समझना ही नहीं चाहते और जो किसान समझाना चाहते वो सरकार समझने को तैयार नही !

             राजनीतिक विचारक अनिल सतभैया के अनुसार यह हास्यास्पद है की सरकार किसानों के हित में जो बिल लाई है उसे लागू होने से पहले ही उसके दुष्परिणामों के प्रति भ्रांतियां फैलाकर तथाकथित किसान नेताओं ने हंगामा मचा रखा है तथा दिल्ली , पंजाब व हरियाणा से जुड़े हुए राजमार्ग, बॉर्डर आवागमन अवरुद्ध ,रेल मार्ग तक उखाड़ कर हजारों की तादाद में मोबाइल टावर क्षतिग्रस्त कर अपनी बात मनवाने हेतु आंदोलत है जिसने आम जनता का जनजीवन अस्त व्यस्त कर दिया है सतभैया के अनुसार अगर मुद्दों पर कोई विसंगतियां हैं तो बातचीत का रास्ता ही सर्वोच्च है और केंद्र सरकार लगातार आंदोलनकारियों से यह गुहार कर रही है कि वह बातचीत का रास्ता अपनाकर समाधान निकालें।

आवागमन अवरुद्ध कर आम जनता को तकलीफ देने की राजनीति पोषित ‘बंद’ तथा ‘आंदोलनों’ की तथाकथित नीति कहां तक उचित है ? इस मामले में तकलीफ भुगत रही आम जनता के अधिकारों के प्रति माननीय सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट रूप से स्वतः संज्ञान लेना चाहिए । अनिल सतभैया के अनुसार वोटों की राजनीति पोषित ‘बंद’ और ‘आंदोलनों’ के कारण आम जनता का जीना हराम हो गया है, सरकार की नीतियों के विरुद्ध जिन दलों को सदनों एवं चुनावों में हार का सामना करना पड़ रहा है वह इन आंदोलनों के पीछे खड़े होकर अपनी वोट बैंक की राजनीति को बखूबी चमका रहे हैं एस पक्ष प्रचाररत है वहीं सरकार भी इस हेतु प्रयासरत है कि जनता के सामने एक्सपोज हो रहे विपक्ष की कुत्सित मानसिकता से आम जनता बखूबी से परिचित हो, इस कारण इतने लंबे समय से सरकार के द्वारा उक्त आंदोलन को समाप्त करवाने हेतु गंभीर पहल नहीं की जा रही है, जिससे बंद एवं आंदोलनों का संत्रास भुगत रही आम जनता को नित नयी कठिनाइयां उठानी पड़ रही हैं सरकार को चाहिए कि कानून में विसंगतियां है तो संसोधन लाया जा सकता है कल की बैठक चार मे से दो मांगों पर सरकार की ओर से कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने सहमति जताई है  माननीय शीर्ष न्यायालय से अनुरोध है की आम जनता के हित में स्वत संज्ञान लेकर इस प्रकार की राजनीति पोषित बंद एवं आंदोलनों के वास्ते स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करें ताकि वोटों की लहलहाती फसल को काटने में लगी राजनीति  का शिकार होने वाले आम जन जीवन को बचाया जा सके।

सतभैया के अनुसार इस विषय में बेहद गंभीर बात यह है कि इस प्रकार के आंदोलनों की सफलता को देखकर अन्य मुद्दों पर भी सरकार विरोधी तत्व  सदन में पास होने वाले प्रस्ताव का सड़क से विरोध करने की नीति को अपनाने हेतु संकल्पित दिख रहे हैं जिससे जाहिर है की इन मुद्दों पर आम गरीब किसान तो मात्र एक जरिया ही है जिसके कंधे पर रखकर यह राजनीतिक बंदूकें चलाई जा रही हैं, लोगों को स्वतत्रता का अधिकार है विपक्ष मजबुत हो ताकि सही और ठोस कानून देश की तरक्की और खुशहाली के लिए लाये जा सके। सभी की सहमति और चर्चा से से सदन पटल पर कानून लाया जाता है वो देश हित मे आम लोगो के हित होता है। पर सरकार के खिलाफ जब लोग सड़कों पर उतरें और निर्णय मे देरी हो तो सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध है कि भविष्य में ऐसे बंद तथा आंदोलनों का क्या स्वरूप हो ? जिससे की आम जनता प्रभावित न हो, इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी होना चाहिए ।

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