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पश्चिम बंगाल का दंगल: सडक, संसद, कोर्ट, तक शह मात का खेल जारी, क्या कहते हैं विशेषज्ञ-

यह मुद्दा अब देश की संसद और चुनाव आयोग के बाद सुप्रीम कोर्ट से लेकर कोलकता हाईकोर्ट तक पहुँच गया

कोलकता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में रविवार शाम से शुरू हुआ 2019 का सबसे बड़ा दंगल अब भी जारी है. कोलकाता पुलिस कमिश्नर के घर से शुरू होकर फिर सड़क से होते हुए यह मुद्दा अब देश की संसद और चुनाव आयोग के बाद सुप्रीम कोर्ट से लेकर कोलकता हाईकोर्ट तक पहुँच गया हैं.

दरअसल लोकसभा चुनाव के लिहाज से इस बार पश्चिम बंगाल आर-पार की लड़ाई का केंद्र बन गया है, जहाँ एक ओर बीजेपी पश्चिम बंगाल में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है, वहीं ममता बनर्जी भी उसे रोकने के लिए पूरी तरह से मुस्तैद हैं. अब मोदी बनाम ममता की ये लड़ाई अलग-अलग मोर्चों पर कुछ ऐसे आगे बढ़ रही है……………….

हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट

रविवार रात को जब सीबीआई के अधिकारियों को कोलकाता की पुलिस ने धरा, तो सीबीआई सोमवार सुबह देश की सर्वोच्च अदालत की शरण में पहुंची. सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने ममता सरकार के खिलाफ काम में बाधा डालने का आरोप लगाया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उल्टा सीबीआई को कहा है कि कमिश्नर के खिलाफ कोई सबूत हैं तो पेश करें. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जब तक कोई सबूत नहीं होंगे, तब तक कोई कार्रवाई नहीं होगी. अब इस मसले की सुनवाई मंगलवार को होगी.

दूसरी ओर कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार भी कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचे हैं. उन्होंने हाई कोर्ट से अपील की है कि उनके खिलाफ जारी सभी नोटिस पर स्टे लगाया जाए. इस पर भी कल ही सुनवाई होगी.

संसद में भी पक्ष-विपक्ष में महासंग्राम

सोमवार को जैसे ही संसद की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्ष ने आक्रामक रूप से सीबीआई विवाद का मुद्दा उठाया. कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत अन्य विपक्षी पार्टियों ने कोलकाता के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा और सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाया. जवाब में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सीबीआई के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच करने पहुंचे थे, लेकिन उन्हें काम नहीं करने दिया. जिस दौरान राजनाथ सिंह लोकसभा में जवाब दे रहे थे, तब लोकसभा में टीएमसी के सांसदों ने ‘’सीबीआई तोता है, तोता है…तोता है’ के नारे लगाए.

चुनाव आयोग के दरबार में बीजेपी

एक तरफ टीएमसी केंद्र सरकार पर सरकारी संस्थाओं के दुरुपयोग करने का आरोप लगा रही है, वहीं बीजेपी भी पश्चिम बंगाल की ममता सरकार के खिलाफ चुनाव आयोग पहुंची है. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की अगुवाई में बीजेपी के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग में कहा कि ममता बनर्जी की सरकार पार्टी के नेताओं को बंगाल में रैली नहीं करने दे रही है. गौरतलब है कि पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, फिर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बंगाल में हेलिकॉप्टर उतारने की इजाजत नहीं दी गई थी.

सड़क पर हल्लाबोल

ममता बनर्जी रविवार रात 8 बजे से ही केंद्र सरकार के खिलाफ धरने पर बैठी हैं. और धरना स्थल से ही सरकार चला रही हैं, सोमवार दोपहर को उन्होंने वहां कैबिनेट बैठक भी की. ममता के धरने में समाजवादी पार्टी के नेता भी पहुंचे. वहीं, टीएमसी के समर्थक बंगाल के अन्य हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे हैं, कुछ जगह रेल रोकी गई तो वहीं हाइवे को भी बंद किया गया.

विशेषज्ञों की अपनी अपनी राय 

वरिष्ठ वकील गौतम अवस्थी बताते हैं कि लॉ एंड ऑर्डर राज्य के अंतर्गत आता है लेकिन सीबीआई अपने दिशानिर्देशों के हिसाब से केंद्र सरकार के विभागों या मंत्रालयों से संबंधित अपराधों के मामलों में दख़ल दे सकती है. जैसे कि 10 करोड़ से ऊपर के भ्रष्टाचार के मामले सीबीआई को ही जाते हैं. दूसरा, अगर राज्य ख़ुद किसी मामले में सीबीआई जांच की दरख़्वास्त दे तो सीबीआई जांच हो सकती है.

तीसरा, अगर किसी मामले में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया हो तो तब राज्य की इजाज़त का मसला नहीं होता.

गौतम अवस्थी कहते हैं, “राज्यों के सीबीआई को बैन करने के फ़ैसले के बाद भी जो मामले सीबीआई के दायरे में आते हैं, वहां बेशक सीबीआई अपना काम करती रहेगी. अगर केंद्र सरकार के किसी दफ्तर में कहीं भी, किसी भी राज्य में कोई अपराध हो रहा है तो केंद्र सरकार सीबीआई को अपनी शिकायत दे सकती है और सीबीआई को जांच करनी होगी. उसमें राज्य की इजाज़त की ज़रूरत नहीं होगी.”

गौतम अवस्थी पश्चिम बंगाल के शारदा चिट स्कैम का उदाहरण देते हुए समझाते हैं, “सबसे पहले इस स्कैम की शिकायत राज्य पुलिस में दर्ज हुई. किसी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि बहुत से राजनेता इस मामले में शामिल हैं तो राज्य पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती, इसलिए सीबीआई जांच का आदेश दिया जाए.” “तो याचिका को दाखिल किया गया, उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा और कोर्ट ने माना कि इस मामले में उड़ीसा और बाक़ी राज्य भी शामिल हैं तो सीबीआई जांच की जा सकती है. लेकिन अगर कोर्ट ना कहता और सिर्फ़ केंद्र सरकार अपने स्तर पर जांच का आदेश देती तो राज्य मना कर सकते थे.

सीबीआई के पूर्व जॉइंट डारेक्टर एन.के. सिंह मानते हैं कि इस फ़ैसले का असर सीबीआई पर पड़ेगा ही. “सीबीआई केंद्र सरकार के अफ़सरों पर तो कार्रवाई कर सकती है, उस पर कोई रोक नहीं है. लेकिन किसी राज्य में सर्च करना है, छापा मारना है तो उस वक्त राज्य की इजाज़त की ज़रूरत पड़ेगी. मान लीजिए राज्य ने पहले कंसेट दे दिया था लेकिन बाद में जिस भी दिन कंसेट वापस ले लिया तो सीबीआई उस दिन से राज्य में ऑपरेट नहीं कर पाएगी.”

“पुरानी बात है, जब मैं सीबीआई में था तो नगालैंड के मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था. उस वक्त नगालैंड ने कंसेंट वापस ले लिया था. कर्नाटक ने वापस ले लिया था. वैसे भी आज के वक़्त में सीबीआई इतनी कमज़ोर हो गई है, आम लोग भी जानते हैं कि सीबीआई काम कर ही नहीं रही. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सीबीआई के अंतरिम निदेशक कोई फ़ैसले नहीं लेंगे. फिर राज्य क्यों उन्हें इजाज़त देंगे? सीबीआई में कौन फ़ैसले लेगा?”

संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य कहते हैं कि केंद्र-राज्य संबंध सिर्फ़ सीबीआई पर निर्भर नहीं करते हैं.  वह कहते हैं, “केंद्र और राज्य के अधिकार स्पष्ट हैं. केंद्र चाहे तो संसद में सीबीआई को लेकर पुराने क़ानून में संशोधन कर सकता है लेकिन फ़िलहाल जो क़ानून है, वह कहता है कि सीबीआई को किसी भी राज्य में ऑपरेट करने के लिए उस राज्य की सरकार की इजाज़त लेनी पड़ती है. मौजूदा क़ानून में ये साफ़ है. बाकी राज्य भी ये कदम उठा सकते हैं.”

वहीं गौतम अवस्थी मानते हैं कि सीबीआई को अब राज्य भी राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. उनका कहना है, “ये मुद्दा क़ानून और व्यवस्था का उतना नहीं है जितना कि केंद्र-राज्य संबंध का है. किसी अपराध में जांच होनी चाहिए और सज़ा मिलनी चाहिए, इस पर तो कोई दो राय नहीं हो सकती. लेकिन ऐसे वक़्त में, जब सीबीआई की अंदरूनी लड़ाई बाहर आ रही है और लोगों का उसपर विश्वास काम हो रहा है, तब राज्य इसे राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे. वे इसे राजनीतिक स्टैंड लेने के लिए इस्तेमाल करेंगे कि हमारा सीबीआई में भरोसा ही नहीं है.”

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